धन-प्रेषण : यह ग्राहकों को प्रदान की
गई सुविधा है जिसमें उनके अनुरोध पर बैंक अपनी किसी एक शाखा से दूसरे केन्द्र में
स्थित बैंक की दूसरी शाखा में निधि अंतरण करने की व्यवस्था की जाती है। इस प्रक्रिया
में एक शाखा निधि प्राप्त करती है(इसे
प्रेषक शाखा कहते हैं) जबकि दूसरी शाखा जिसको निधि का अंतरण किया जाता है निधि का
भुगतान करती है(इसे प्रेषती शाखा कहते हैं)।इस प्रक्रिया में निधि का अंतरण भौतिक
रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर नही
किया जाता है।इसमें प्रेषक बैंक की किसी शाखा में नकदी जमा करता है और हिताधिकारी
समतुल्य राशि किसी दूसरी शाखा से प्राप्त करता है।
चूंकि
प्राय: धन प्राप्त करने और उसका वास्तविक रूप से भुगतान होने के बीच पर्याप्त समय
रहता है जिससे बैंक को इस दौरान बिना लागत के फ्लोट मनि प्राप्त हो जाती है जिसको
वह प्रभावी रूप से डिप्लाय (उपयोग) करती है। इसके साथ ही बैंक को इन उत्पादों की बिक्री से उचित कमीशन भी
प्राप्त होता है। डीमाण्ड ड्राफ्ट,
टेलीग्राफिक ट्रांसफर ,मेल ट्रांसफर और इलेक्ट्रानिक फण्ड ट्रांसफर,बैक ऑडर
इत्यादि कुछ एक धन प्रेषण के माध्यम हैं। सीबीएस के कारण प्रेषण की यह पद्धतियां अब
धीरे धीरे लुप्त होने लगेंगी।
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