बैंकर और ग्राहक के बीच कई संबंधों के कारण बैंक के कुछ अधिकार हैं।
1.धारणाधिकार
धारणाधिकार देनदार द्वारा स्वाधिकृत माल और प्रतिभूतियों पर कब्जा बनाए
रखने का लेनदार का अधिकार है और तब तक रहता है जब तक, देनदार से देय कर्ज अदा नहीं
हो जाता (भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 131)
- तथापि, लेनदार को माल बेचने का अधिकार नहीं है।
- लेनदार केवल ॠण की चुकौती तक माल/संपत्ति को रख सकता है।
- तथापि, बैंक का धारणाधिकार अलग है।
- यह एक गर्भित गिरवी है।
धारणाधिकार दो प्रकार के होते हैं:-
साधारण धारणाधिकार और विशेष धारणाधिकार
बैंक का धारणाधिकार साधारण धारणाधिकार है।
- यह उन सभी वस्तुओं तथा प्रतिभूतियों पर लागू होता है जिन्हें बैंकर ने
बैंकिंग कारोबार के दौरान प्राप्त किया है।
- धारणाधिकार के लिए अलग से कोई करार आवश्यक नहीं है।
- परिसीमा अधिनियम लागू नहीं होता है।
अपवाद
-
सुरक्षित
अभिरक्षा में रखी वस्तुएं
- अपरिपक्व ॠण
- विशिष्ट उद्देश्य से जमा दस्तावेज / धनराशि
- बैंक परिसर में भूल से छूट गयीं प्रतिभूतियां /
बहुमूल्य वस्तुएं
२. समंजन अधिकार
जब ग्राहक द्वारा उसी क्षमता में खोले गए एक से अधिक खातों की स्थिति में
बैंक उसके एक खाते से राशि दूसरे खाते में अंतरित करता है।
शर्तें
- वही नाम और वही अधिकार
- कर्ज देय हो तथा निरपेक्ष हो
- कोई प्रतिकूल करार न हो
- यह बैंकर का विवेकाधिकार है। ग्राहक इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता।
क्लेयटन मामले में नियम
खाते की डेबिट पक्ष की पहली मद उन्मोचित होती है तो क्रेडिट पक्ष की पहली
मद द्वारा कम कर दी जाती है। खाते में क्रेडिट प्रविष्टियां कालक्रमिक रूप में
डेबिट प्रविष्टियों को समायोजित या समंजित करती हैं।
नकद साख खाते एवं चालू खाते में क्लेयटन नियम लागू होगा। यह नियम सावधि
जमा राशियों, बचत बैंक खातों इत्यादि पर लागू नहीं होगा।
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