Saturday, 7 February 2015

बैंक के लिए कम लागतवाली जमा क्यों इतनी महत्वपूर्ण होती हैं ?


कम लागतवाली जमाएं वास्तव में बैंक को अपने निधि लागत को कम करने में सहायक होती। इसलिए बचत और चालू जमा में वृद्धि करने का प्रयास किया जाता है। ऐसे देखा जाए तो हम पाएंगे कि कार्पोरेट सेक्टर द्वारा निधि का उपयोग करते हुए चालू जमाओं को  खत्म कर दिया जाता है इसलिए बचत जमा ही केवल मात्र बहुमूल्य संसाधन के रूप में उपलब्ध होती हैं।
अब सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने इसके महत्व को समझते हुए कम लागत के जमा पर बल डालना शूरू कर दिया है । डीमॉण्ड डीपोजिट ही बैंक की लाभप्रदता की कुंजी होती है। अत: नेट इंट्रेस्ट मार्जिन को कम करने हेतु हमें जमा लागत को कम करना ही होगा। इसके लिए हमें अपने जमा और चालू जमाओं में तेजी से वृद्धि करनी होगी।
वैसे देखा जाए तो बैंक के लिए मीयादि जमाएं जो एक सप्ताह से लेकर कुछ वर्षों तक की अवधि के लिए जमा की जाती हैं बहुत ज्यादा खर्चीली होती हैं क्योंकि इसमें उसे लगभग 11% तक का उच्च ब्याज दर का भुगतान करना पड़ता है । वहीं देखा जाए तो उन्हें चालू खाते में ब्याज का भुगतान करना नही पड़ता है। प्राय: चालू खाता बड़े कारबारी या हाई नेट वर्थवाले व्यक्तियों के होते हैं जो कि अपने खाते में काफी परिचालन करते हैं पर दिनांत उनके खाते में बहुत कम निधि शेष रहती है ऐसी स्थिति में बैंक उन्हें एक निर्धारित निधि उनके खाते में रखने हेतु बाध्य करती है। बचत जमा में भी बैंक को काफी कम ब्याज दर का भुगतान (4%) करना पड़ता है। पर देखा जाए तो बैंक और भी कम ब्याज का भुगतान करती है क्योंकि वह 1 तारीख से 10 तारीख तक के जमा तथा माह के न्यूनतम बैलेंश को ध्यान में रखते हुए ब्याज का भुगतान करती है। इस तरह उसे लगभग 2% से भी कम ब्याज का भुगतान करना पड़ता है। (इस नियम में 1 अप्रैल 2010 से परिवर्तन  है जिसमें दैनिक आधार पर प्रोडेक्ट की गणना की जाएगी)

ग्रामीण क्षेत्र ,कम लागत के जमाओं का खजाना होता है। बैंक ग्रामीण भारत के अधिक से अधिक  ग्राहकों तक पहुंच कर कम लागत की जमा संग्रहित कर सकती है।यदि देखा जाए तो हमारी व्यस्क जनसंख्या की लगभग 59% के पास बैंक खाता है पर यदि हम हमारे संपूर्ण जनसंख्या की तुलना में देखें तो यह मात्र 31% ही है। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यस्क जनसंख्या शहरी क्शेत्र के 60% की तुलना में काफी कम है जो कि लगभग 39% मात्र ही है । वास्तव में ग्रामीण क्षेत्र के कम मूल्य की जमाओं की लेनदेन लागत काफी अधिक होती है,पर बैंकों द्वारा सही तकनीकी का उपयोग करते हुए इसे कम किया जा सकता है। जब बैंक अपने ब्याज दर में कमी करती हैं तो स्वभाविक है कि उसकी ब्याज आय में कमी होगी। इस स्थिति में यदि वह अपने जमा दर को कम न कर सके तो उसका एनआईएम प्रभावित होगा। सामान्यतह यह देखा गया है कि ब्याज दर में वृद्धि होने की स्थिति में बैंक अपने ब्याज दर को शीघ्र बढ़ा देती है पर जमाओं पर वह बहुत गंभीर विचार करने के उपरांत ही उसमें बढोतरी करती है। इसका एक प्रमुख् कारण यह होता है कि ऋणॉं पर ब्याज दर को बढ़ाए जाने या उसे कम करने की स्थिति में इसका प्रभाव बैंक के संपूर्ण ऋण पोर्टफोलिओ पर पड़ता है और उसे रिप्राइस करने की आवश्यकता पड़ती है पर यह जमाओं पर लागू नहीं होती हैं क्योंकि नया दर केवल मात्र नए जमाओं और जब पुराने जमा परिपक्व होटल हैं केवल उन पर ही लागू होतीं हैं।

वास्तव में क़ासा जमा लागत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चालू खाता यह  मूल रूप से व्यवसायी वर्ग के लिए होती है जो कि अपने खाते में नित्य बहुत सारा लेनदेन करते हैं।इन खातों का परिचालन मूल रूप से चेक के माध्यम से होता है और ग्राहक अपने खाते में कितनी भी राशि सारे दिन भर में जमा कर सकती है या निकाल सकती हैं।प्राय: यह देखा गया है कि इन खातों में बैंक न्यूनतम बैलेंस रखने हेतु दबाव डालती है । बैंक नियमित रूप से  चालू खात के परिचालन हेतु सेवा प्रभार प्रभारित करती वहीं वह उसके चालू खाते में ब्याज का भुगतन भी नही करती है।

वहीं बचत खाते जो मूलतह व्यक्तिगत खाते होते हैं इसमें गैर वित्तीय लेनदेन होती हैं। बैंक, इसमें निर्धारित संख्या से ज्यादा बार परिचालन करने पर उनसे सेवा प्रभार वसूला जाता है । इन खातों मे भी न्यूनतम बैलेंस रखना आवश्यक होता है। जिस पर बैंकों को 4% ब्याज का भुगतान करना पड़ता है ।
सभी बैंक अपने कासा में वृद्धि करना चाहती है क्योंकि यदि कासा ज्यादा होगी तो स्वभाविक रूप से उनकी जमा लागत भी कम होगी। निजी बैंकों में एक्सीस बैंक का कासा सर्वाधिक है यह लगभग46% है इसके बाद एचडीएफसी बैंक है जिसका कासा जमा 44.4% है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नेशनल बैंक का कासा अधिक है यह उसके कुल जमा का लगभग 40% है। अप्रैल 2010 से कासा लागत में बढ़ोतरी होने जा रही है क्योंकि उनको दैनिक बैलेंस पर ब्याज का भुगतान करना पड़ेगा। वर्तमान में भारतीय बैंकिंग सिस्टम में जमाओं पर देयता 39 ट्राइलियन रूपये का है। इसमें से लगभग 26% बचत खाता से संबंधित है। इस तरह यह अनुमान लगाया जा रहा है कि बैंकिंग सिस्टम को 7,000 करोड़ रू. का अतिरिक्त ब्याज का भुगतान करना होगा। यह वित्तीय वर्ष 2009 में सार्वजनिक बैंकों के कुल लाभ का एक चौथाई भाग है।  
यह किस तरह बैंकों के लिए महत्वपूर्ण हैं
उच्च कासा अनुपात का मतलब हुआ बैंक में जमा का अधिक भाग चालू और बचत जमा से आया हुआ है जो कि मूलतह निधिओं का सस्ती स्त्रोत होती है।इस तरह जैसे ही कासा का अनुपात बढ़ेगा वैसे ही नेट इंट्रेस्ट मार्जिन भी अच्छा हो जाएगा।जिसका मतलब हुआ कि बैंक की परिचालन क्षमता भी अच्छी होती जा रही है।

नेट इंट्रेस्ट मार्जिन यह कुल ब्याज आय और व्यय के अंतर को दर्शाता है कासा से प्राप्त उच्च आय यह नेट इंट्रेस्ट मार्जिन को  बढ़ाता है क्योंकि इसमें निधि की लागत कम हो जाती है। उदाहरण के तौर पर बैंक, 10% पर ऋण प्रदान करती है जबकि वह बचत जमा पर मात्र 3.5% का ही भुगतान करती है।
तकनीकी ने बैकों के निधियों के लागत में कमी लाने हेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बैंकों द्वारा एटीएम की स्थापना ने जमा खाताधारकों के लिए बहुत ज्यादा सुविधा उपलब्ध करवा दी है चूंकि हमारे देश का लगभग 70% जनसंख्या अभी भी गाओं में ही निवास करती है अत: उन्हें यह सब सुविधाएं अपलब्ध करवाया जाना आवश्यक होता है। नई पेंशन योजनाएं,और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कार्यक्रम,के तहत ग्रामीण ग्राहकों को अच्छी सुविधाएं मुहैआ करवाई जानी चाहिए।हमारे लिए कनेक्टीविटी उपलब्ध करवाना ही सबसे कठिन काम है।

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