Sunday, 22 February 2015

वाणिज्यिक बैंकों द्वारा कृषि वित्त प्रदान करने के लिए भारिबैं का दिशानिर्देश


सामान्‍य उद्देश्‍य एवं दृष्टिकोण
वाणिज्यिक बैंकों का मुख्‍य उद्देश्‍य कृषि क्षेत्र में वित्‍त प्रदान करके किसानों को नई और उन्‍नत तकनीकी को अपनाकर जीवन स्‍तर में सुधार लाना है। कृषि क्षेत्र में दिया जाने वाला ॠण उद्देश्‍य परक हो ताकि वे आधिक्‍य को बढ़ा सकें।
बैंकों का कृषि क्षेत्र में वित्‍त प्रदान करते समय मुख्‍य उद्देश्‍य उत्‍पादकता बढ़ाने जैसे नए निवेश नए उत्‍पाद के साथ उनकी आय में बढ़ोतरी करे। नए साधनों को लाना मुख्‍य प्राथमिकता होनी चाहिए न कि विद्यमान प्रतिभूति को बदलना।
कृषि क्षेत्र में पारम्‍परिक या विद्यमान रूप में एक साथ नहीं रखी जा सकती। कृषि वित्‍त इस वाणिज्यिक बैंकों द्वारा इस प्रकार प्रदान किए जाएं ताकि खेतिहर लोगों को वाणिज्यिक बैंकों की परिधि में लाया जा सके िफर  उत्‍पादकता बढ़ाते हुए उत्‍तरोत्‍तर आय में बढाना मुख्‍य उद्देश्‍य है।
कृषि क्षेत्र में वित्‍त प्रदान करने में फंड उपलब्‍धता अन्‍य क्षेत्रों की अपेक्षा पर्याप्‍त मात्रा में है। जब अपेक्षित वित्‍त बैंकों से नहीं हो पाता है तब किसान कहीं और से उधार ले रहे हैं और यह माना जाता है कि वे मुख्‍य प्रदाता है और उसे परोपकारी माना जाता है। इससे बैंक और ॠण लेने वाले के बीच स्‍थायी रिश्‍ते प्रभावित होते है।
ॠणी के साथ निरन्‍तर संपर्क बनाए रखें जो ॠणी वसूली के प्रयोजन के लिए, कृषक को शिक्षित करने और उसमें नियमित भुगतान की आदत डालना व्‍यापक उद्देश्‍य होना चाहिए। अब तक बैंकों ने अपनी गतिविधियों को उच्‍च क्षमता की ओर केंद्रित किया है जिससे वे बिचौलिए पर निर्भर हो गए है। भविष्‍य के लिए उन्‍हें और कठिन क्षेत्रों में जाना होगा ताकि पुराने ॠणों की वसूली अभियान और मजबूत होगी।
अभियान का क्षेत्र ओर कर्मचारी
हाल के अनुभव ने दिखा दिया है जब बैंक सेवा क्षेत्र दृष्टिकोण अपनाते है तब वे बेहतर परिणाम प्राप्‍त कर रहे हैं।  उस क्षेत्र में संसाधनों की समग्र कमी की संभावना से बचने के लिए यह अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है कि शाखा में कर्मचारियों की उपलब्‍धता के अनुरूप दो या दो दो से अधिक बैंकों द्वारा अविव्‍यापी की संभावना से बचने का प्रयास करे। वित्‍त को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ग्रामीण एवं अर्द्व शहरी शाखाएं पर्यवेक्षण के माध्‍यम से उन्‍मुख उत्‍पादन को प्रा‍थमिकता देने के लए सेवा क्षेत्र नाम के एक निर्धारित क्षेत्र को आवटित करें। शाखाएं उनकी प्राथमिका प्राप्‍त क्षेत्र के अन्‍तर्गत उधार सीमित करें। जब कि अन्‍य शाखाएं जिन्‍हें निर्दिष्‍ट क्षेत्र नहीं दिया गया है वे आमतौर पर 20 किमी की त्रिज्‍या के भीतर वित्‍त कर सकते हैं।
इस क्षेत्र के लिए 450-500 उधारकर्ताओं के लिए एक पर्यवेक्षक के मानदंड को अपनाया जा सकता है। हांलाकि जहां एक से अधिक फसल पद्धति का तरीका है और मौसम फसल को ओवर लैप करते हैं दो सेट स्‍टाफ पर विचार किया जा सकता है। एक प्रस्‍तावों के मूल्‍यांकन के लिए और अन्‍य जांच पड़ताल एवं प्रभावशाली वसूली के लिए। पूर्वोक्‍त दूरी की सीमा केवल एक गैर सेवा क्षेत्र शाखाओं के लिए दिशानिर्देश  है ताकि बैंके जिनके खेत बिखरे हुए है या ॠण कार्यालय से बहुत है जिनकी देखरेख करना मुश्किल और अप्रभावी है उनके लिए इस 20 किमी के प्रतिबन्‍ध के कठोर नियम है।
और यदि खास शाखा यह मानती है कि वे इससे परे कुछ ॠण प्रस्‍तावों की निगरानी कर सकता है वहां रोकने के लिए कुछ ऐसा नहीं है।
तथ्‍यत: जहां एक उचित मात्रा में कापेक्‍ट क्षेत्र से आवेदन प्राप्‍त हो रहे है और प्रक्रिया और निगरानी आसान हो सकती है चाहे वे 20 किमी की परिधि से बाहर हो शाखाओं को ऐसे आवेदन पत्रों को व्‍यवहार्यता के आधार पर स्‍वीकृति दी जा सकती है। उन्‍हें सिर्फ इस वजह से अस्‍वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वे सामान्‍य क्षेत्र से बाहर के है। यदि वे उन्‍हें प्रभावी ढंग से संचार सुविधाओं के द्वारा सेवित कर सकते है तब ये दिशानिर्देश न केवल कृषि अग्रिमों पर लागू होते है बल्कि अन्‍य अग्रिमों के लिए भी लागू होंगे। जहां निर्दिष्‍ट सेवाएं नहीं दिया गया है।
शाखा प्रबन्‍धकों को विवेकाधीन शक्तियों इस प्रकार प्रदत्‍त हैं कि कम से कम 80% प्रस्‍तावों को केन्‍द्रीय कार्यालय के संदर्भ के बिना वित्‍त के पैमाने के अन्‍तर को देखते हुए मंजूरी दी जा सके। इस सम्‍बन्‍ध में एकरूपता के अनुसार कार्य किया जाना चाहिए।
शाखा प्रबन्‍धक को अपने अधिकार क्षेत्र से संबंधित बुनियादी कृषि आंकड़े रखने चाहिए।
क्रेडिट मानक एवं वित्‍त पैमाना
फसलों ॠण वित्‍त पैमाने के अनुसार दिया जाना चाहिए जिसे लीड बैंकों के प्रतिनिधि एवं वाणिज्यिक बैंकों के जिनकी अधिक शाखाएं उस क्षेत्र में होती है। एक प्रतिनिधिक के साथ तकनीकी समिति द्वारा तैयार किया जाता है।
फसल उगाने के लए अल्‍पावधि ॠण साधारणत: नकद एवं घटक प्रकार में विभाजित किया जा सकता है। यह सुनिश्चित किया जाए कि घटक प्रकार वास्‍तविकता ने उठाया गया है और बैंक द्वारा आवश्‍यक भुगतान सीधे किया जा सकता है। बेड पैमाने पर नकदी घट की अतिरंजना की एक प्रवृत्ति साक्ष्‍य के रूप में सामने आई है। इस क्षेत्र में कार्य हो कि दोनों क्षेत्रों में चाहे खेती हो या विशेष ॠणी दोनों में वास्‍तविकता का पुट हो (जैसे उनके द्वारा कार्यरत मजदूरों की संख्‍या, उनकी अपनी और परिवार की आवश्‍यकता की खपत) आमतौर पर नकदी घटक सूचनाओं के मूल्‍य का 30% के आसपास ही होता है।
मध्‍यम अवधि के ॠणों में मानदण्‍ड प्रस्‍तावित निवेश से होने वाली आय की संभावना पर ज्‍यादा निर्भर करता है न कि जो ता आकार जैसे एक निश्चित क्षेत्रफल में कंपोजिट कुआं खोदना या पंपसेट के लिए ॠण उनी फसल पद्धति के लिए लाभकारी हो सकता है वहीं दूसरे क्षेत्र में सच नहीं हो सकता। यदि ॠण नाबार्ड योजनओं के तहत दी है, शाखाओं को नाबार्ड की यूनिट कॉस्‍ट कमेटी द्वारा निर्धारित यूनिट लागता का पालन करना चाहिए।
मार्जिन उधारकता के प्रकार एवं गतिविधि पर निर्भर हैं। प्राथमिकता क्षेत्र के अन्‍तर्गत 0-25% तक भिन्‍न होता है।
कोई मार्जिन नहीं पर जोर है।
गैर फार्म क्रियाओं के लिए रू.25000/- तक की गतिविधियों पर मार्जिन माफ है।
रू. 25000/- तक के कृषिॠण अतिरिक्‍त सुरक्षा से परे रखे गए है जहां बैंक वित्‍त द्वारा प्रतिभूति बनाई जा रही है।
चूंकि बैंकों को विभिन्‍न एजेंसियों से विज्ञापन के जरिए तदर्थ ॠण किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए संपर्क रखना पड़ता है अत: यह अच्‍छा होगा कि वे खेतिहर को उनकी निर्दिष्‍ट उद्देश्‍य के लिए उनकी पूरी जोत बंधक करने की सलाह दें न कि जोत के एक भाग को।

ॠणी के पहचान लिए फोटो जरूरी है शाखाएं इसके लिए स्‍वयं व्‍यवस्‍था करे और कमजोर वर्ग के श्रेणी के ॠणियों का खर्च स्‍वयं वहन करें।
आवेदन प्राप्‍त / स्‍वीकृत / अस्‍वीकृत प्रस्‍ताव का रजिस्‍ट रखें।
एसजीएसवाई लाभार्थियों को पास बुक दें।
नोट जहां अनुदान उपलब्‍ध हो उसे मार्जिन माना जाना चाहिए न कि अलग से और कोई  मार्जिन निर्धारित करें।
मौसम एवं समय
बैंकों को संचालन शुरू करने के पूर्व ग्राहकों के मध्‍य अच्‍छी तरह से प्रचार करना चाहिए (जैसे मई के मध्‍य में खरीफ तथा सितम्‍बर के अन्‍त में रबी का प्रचार किया जाए) उससे यह सुनिश्चित हो जाएगा वितरण के समय राशि संवितरण हेतु तैयार रखी जाए।
मध्‍य अवधि ॠण संवितरण का उपयुक्‍त समय ऑफ सीजन होगा जब खेतिहर अपनी फसल के साथ व्‍यस्‍त नहीं होगा (मार्च से मई और सितम्‍बर से अक्‍टूबर)
भुगतान एवं वसूली कार्य निष्‍पादन
मध्‍यावधि एवं अल्‍पावधि ॠण देनों के लिए ॠण की चुकौती का समय वो हो जब खेतिहर अपनी फसल को बेचकर तरलता रख सके। अत: शाखा प्रबन्‍धक बाजार आगमन और सभी मुख्‍य फसलों के शीर्ष बिक्री समयावधि का अध्‍ययन करें। ॠण की तारीख इस प्रकार को सूचना के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए। कृषकों को उनके उत्‍पादन की अच्‍छी कीमत मिल जाए इस बात का भी ध्‍यान रखें।

देय तारीख से पहलू वसूली के प्रयास शुरू कर दिए जाने चाहिए। यह पाया गया है कि वे बैंक जो नियमित समय पर सूचनाएं एवं अनुस्‍मारक भेजना शुरू कर देते है एवं जिना फील्‍ड स्‍टाफ समय पर सतर्क होकर तैयार रहता है उनको वसूली के समय ज्‍यादा पर परेशानी नहीं होती है। शाखा प्रबंधक वसूली की गतिविधियों में सुस्‍त न हो लेकिन उचित कार्यवाही करें।
जहां विविध फसल प्रक्रिया अपनाई जा रही है या दो मौसमी फसल उगाई जाती है यह आवश्‍यक है कि मुख्‍य फसल दूसरी है जिस पर निर्वाह किया जा रहा है तब फसल की बाजार में बिक्री और वसूली की तारीख में तालमेल रखा जाए। यह अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है कि किसानों में नियमित भुगतान करने की आदत डाली जाए। यदि उनमें चूक करने की भावना हट जाएगी तब स्‍वत: विकास होगा।
कृषक को चुकौती क्षमता पैदावार की उन्‍नत तकनीकों को अपनाने पर निर्भर करेगी। सकल उत्‍पादन बहुत बढ़ा कर नहीं दिखाया जाना चाहिए। साधारणत: उपज के कुल मूल्‍य का 50% का दो तिहाई अल्‍पावधि फसली ॠण के लिए तथा शेष मध्‍यावधि ॠणों के विकास के लिए उपलब्‍ध रहता है।
अल्‍प एवं मध्‍यावधि ॠण आवश्‍यकताओं के बीच सामंजस्‍य वसूली की दृष्टि से अच्‍छा है। विकास ॠणों को चुकाना उगाई गई फसल से प्राप्‍त आय पर निर्भर है। यदि ॠण दाता बैंक उगाई जाने वाली फसल के लिए उन्‍नत तकनीकों की आवश्‍यकता को ध्‍यान में नहीं रखते है वसूली की संभावनाएं स्‍वत: क्षीण हो जाती है। ऐसा बहुत से फसल की अनुभव रहा है जिन्‍होंने उगाई जाने वाली फसल की आवश्‍यकताओं को नजरअन्‍दाज किया है। वसूली कार्यक्रम हर समय पर्याप्‍त रूप में लचीला हो ताकि प्राकृतिक आपदाओं या प्रतिकूल मौसमी कारकों के समय पुन:चरणबद्धता (रीफेसिंग) अपनाई जा सके।
यह अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है कि वसूली कार्य प्रत्‍येक क्षेत्र और हर मौसम में निरन्‍तक रहें और उनकी समीक्षा की जाती रहे। इस संबंध में वसूली निष्‍पादन ॠण खाते में उठाई गई मांग की कुछ देयता पर आधारित नहीं सम्‍बद्ध होना चाहिए। अत: प्रत्‍येक शाखा की मांग, संग्रह एवं शेष रजिस्‍टर एवं नियत तारीख रजिस्‍टर बनाए।
चुकौती सूची निर्वाह की आवश्‍यक उत्‍पादन क्षमता, लाभार्जन क्षमता को देखते हुए तय की जानी चाहिए। रू.50000/- तक के कुटीर उद्योगों, दस्‍तकारों को ॠण की चुकौती अनुसूची मीयादी ॠण घटक के लिए निर्धारित की जा सकती है। सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रभावित होने पर चूक की स्थित में फसली ॠण को उसे 5 वर्ष के मध्‍यावधि ॠण में परिवर्तित किया जा सकता है तथा विस्‍तार/रीफेसमेंट के  लिए अनुमति दी जा सकती है।
प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित चूक होने पर अन्‍य ॠणियों द्वारा प्रतिभूत के मूल्‍य से अधिक आहरण को एक उचित अवधि के लिए मध्‍यावधि ॠण में परिवर्तित किया जा सकता है।
क्रेडिट फ्लो पैरामीटर (भारत सरकार द्वारा निर्धारित)

अग्रिम का प्रतिशत
1. कुल अग्रिम का 40% प्राथमिकता प्राप्‍त क्षेत्र
2. प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष्‍ज्ञ कृषि अग्रिम 18% (अप्रत्‍यक्ष ॠण कुल कृषि के 25% से अधिक न हों)
3. छोटे एवं लघु उद्योग क्षेत्र में लघु व्‍यवसाय (SSSBEs) कुल लघु उद्योग अग्रिम का 40%
4. कमजोर वर्ग को अग्रिम प्राथमिका प्राप्‍त क्षेत्र के 25% या शुद्ध अग्रिम का 10%
5. विभेदक ब्‍याज दर (डीआरआई) पिछले साल के कुल अग्रिमों के बकाया का 1%
6. ग्रामीण एवं अर्द्ध शहरी शाखाओं के माध्‍यम से कुल डीआरआई अग्रिमों को दो तिहाई डीआरआई अग्रिम।
7. डीआरआई से इतर डीआरआई अग्रिम के 40% हिस्‍सा एससी/एसटी को।



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