Tuesday, 3 February 2015

बैंक के दायित्व्

बैंकर और ग्राहक के बीच कई संबंधों के कारण बैंक के कुछ दायित्‍व होते हैं।
चेकों के भुगतान का दायित्‍व
यह बैंकर का सांविधिक दायित्‍व है कि यदि उसके पास आहरणकर्ता की पर्याप्‍त निधियां हैं तो वह विधिवत् रूप से प्रस्‍तुत किए गए चेक का भुगतान उचित तरीके से करे और यदि वह ऐसा करने में विफल रहे तो ऐसी चूक से हुई हानि या क्षतिपूर्ति के लिए आहरणकर्ता को क्षतिपूर्ति अनिवार्य रूप से करे (परक्राम्‍य लिखित अधिनियम की धारा 31)
खातों की गोपनीयता बनाए रखने का दायित्‍व
- बैंक के मुख्‍य दायित्‍वों में से एक दायित्‍व यह है कि वह ग्राहक के खाते की स्थिति की पूर्ण गोपनीयता बनाए रखें।
-गोपनीयता बनाए रखने का यह दायित्‍व ग्राहक का खाता बंद होने के बाद भी जारी रहता है।
कानून द्वारा अनुमत प्रकटन
- आयकर अधिनियम
- कंपनी अधिनियम
-बैंक बही साक्ष्‍य अधिनियम
- भा.रि.बैंक अधिनियम
- फेमा
- उपहार कर अधिनियम
- ग्राहक की अभिव्‍यक्‍त या निहित सहमति
- बैंक के हित में प्रकटन
उदाहरणार्थ : वाद दायर करने के लिए अधिवक्‍ता, गारंटीदाता इत्‍यादि को जानकारी दी जा सकती है।
- लोक / राष्‍ट्रहित में प्रकटन

ग्राहक के खाते का प्रकटन:सावधानियां
- यह एक सामान्‍य कथन होना चाहिए।
- प्रकटन अफवाहों पर आधारित नहीं होना चाहिए।
- जानकारी बिना समुचित औचित्‍य के नहीं दी जानी चाहिए।
अर्थात्
- ग्राहक के खातों का प्रकटन करते हुए बैंक को अत्‍यंत सावधानी बरतनी चाहिए।
- अनावश्‍यक या अप्रासंगिक सूचना नहीं दी जानी चाहिए।
- राय संक्षिप्‍त और तथ्‍य पर आधारित हो।
- अन्‍य बैंकों / वि.संस्‍था को जानकारी देते समय बैंक यह इंगित कर दे कि यह  जानकारी गोपनीय रूप से दी जा रही है तथा इसे गोपनीय ही रखा जाए।

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